Monday, 12 January 2015

जिंदगी

ज़िंदगी मानो दो हिस्सों में बंट गयी है
एक हिस्सा बचपन का था
बहोत सी यादों से जुड़ा
जब चाँद पे खरगोश दिखता था
नदी मानो समंदर लगती थी
बस का सफर सपनोंमे खत्म होता था
इन्द्रधनुषसे फिसलने को जी मचलता था
स्कुल के बाहर बैठी मौसी से कैरी लेकर खाना मानो हक़ था
घर बहोत बड़ा लगता था , मानो एक सिरे से दुसरे सिरे जाने के लिए साइकल लगेगी
हर पेड़ आसमाँ को छुता नज़र आता, उसपे चढनेकी होड़ लगी रेहती
इमली का बुटा चटखाने में मज़ा आता
बारीश में भीगने से डर नहीं लगता था
जाड़ों में अलाव जलाके घंटो उसके सामने बैठनेमें मज़ा आता
दोस्तों से  झगड़ा करना मानो रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था
माँ-बाबा को देखके लगता था वो कभी बूढ़े नहीं होंगे दादा-दादी की तरह
जिंदगी हसीन लगती थी , फिर भी बड़े होते का इंतज़ार रेहता था

अब ज़िन्दगी का दूसरा हिस्सा है
जहाँ पे माँ -बाबा बूढ़े दिखाई देते है
अब घर उतना बड़ा नहीं लगता
अब पेड़ पे चढ़ाना मनो किसी और दुनिया में जाना
इमली का बूटा देखके अब चटखने को जी नहीं करता
अब बारिश में भीगनेसे डर लगता है

सब बदल गया
मैं भी कहाँ छोटी रही अब ?
जिंदगी  ने बड़े होने की चाह पूरी भी की और ऐसे सबक सिखाये
जो कभी भूल नहीं सकती





नींद आ रही है

कल जब तुम बातें कर रहे थे ,
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

तुम नहीं थे , तब आती ही नहीं थी
कहीं पे जा बसती थी , बिना बताये
कितना भी बुलाओ , ध्यान ही नहीं देती थी
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

रात की स्याही में डुबें हुए तारों को मैं देखती रहती
कभी कभी तो उस स्याही से तुम्हारा नाम लिखा करती थी
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

यादों में डूबकर जब पूरी रात तुम्हें पुकारा करती , कहीं से कोई जवाब न आता
सूरज निकल आता , पर नींद नहीं
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

अब जब तुम आ गए हो , मेरे पास हो
तो दूर ही नहीं जा रही , तुम्हारी गोदी में इतने सपने सजा रही है
उफ़ , के पूछो मत
पर जब तुम नहीं थे, तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी 

Friday, 9 January 2015

चाँद-४

आज चाँद जमीं के इतने करीब था
के मेरे हाथों में आ गया

मेरा हाथ अपने हाथोंमें लेकर
ले गया मुझे , दुनिया की सैर कराने

कितने पहाड़ , नदियाँ , पेड़ , झरने पीछे गए
सबको छोड़ के हम दूर ही जा रहे थे
मानो अपनी दुनियाँ खोज़ रहे थे

बहोतसीं बातें भी की हमनें
ऐसे लग रहा था कोई भटकता सय्यारा घर वापस आ गया हो

तुम भी कभी आना , चाँद की तरह
अपने हाथों में , मेरा हाथ लेके , ले जाना मुझे चाँद के उस पार
तुम्हारी दुनियाँ में

Thursday, 8 January 2015

चाँद-3

लुकछुपी खेलता रेहता है उसकेसाथ
कभी बादलोंके पीछे छुपकर , तो कभी किसी पहाड़ी के पीछे
कभी किसी पेड़ के पीछे , तो कभी एकदम से सामने आके चौंका भी देता है
पर सूरज जब आता है , तो ये छुप जाता है
उसके गुस्से से डरता है शायद
जिस दिन वो नहीं दिखता , बेहाल होती है वो
उसका दिल नहीं लगता , ढूंढती है उसे
कहाँ गया ? कहाँ गया?
कही उफ़क़ के पार सूरज ने उसे पकड़ के तो नहीं रखा ?
और दूसरे दिन जब वो झाँकता है , फुली नहीं समाती वो
उसके जिगर का टुकड़ा जो है
वो चाँद , जिसने उसकी कोख से जनम लिया है।


Tuesday, 6 January 2015

चाँद-२

आज चाँद जमीं के इतने करीब था , के मानो हाथोंमें समां जाये
भिखारी बच्ची ने पकडनेकी कोशिश भी की
पगली कहीं की
कभी चाँद भी भिखरियोंके हाथ लगता हैं ?
नहीं समज़ती
वो आसमां में ही रहता हैं
वो तुम्हे दिखता है काफ़ी है
नहीं तो कलसे उसे देखने के भी पैसे पड़ेंगे