Tuesday, 14 April 2015

किश्त

ज़िन्दगी किश्तोंमे बिताती है
कोई किश्त बचपन की तो कोई जवानी की
हर किश्त की अपनी कहानी होती है
हर किश्त की अपनी आह होती है


कभी दोहराना चाहुँ तो सिर्फ यादोंके चिकटठे मिलते है
किश्ते वापस नहीं मिलती

वो साहूकार जो ऊपर बैठा है , किश्ते लिए जाता है
उसका असल कभी चूका नहीं पाते हम

और इन्ही किश्तोंके के साथ दुनियासे उठ भी जाते है
अपनी कुछ यादें छोड़कर , असल लेकर

ज़िन्दगी की आखरी किश्त पूरी करते
ज़िन्दगी किश्तों में बंटी है 

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