Friday, 27 March 2015

नया बसेरा

दिल करता है , कहीं उड़ाती चली जाऊँ 
उस सूखे पत्ते की तरह 
जो अभी अभी शाख से हवा ने उड़ाया है 
उस सफ़ेद आक की तरह 
जो अभी अभी हवा में उड़ने लगी है 
उस पतंग की तरह 
जो अभी अभी कट गयी है 
उस बच्चे के हाथ से छूटे गुब्बारे की तरह 
जो हवा के साथ किसी अंजाने सफर पे निकली है 

ना रास्ते का पता हैं 
ना मंज़िल का 
ना किसी का साथ है 
ना साथ होने की उम्मीद 

बस उड़ते जाना है 
हवा के साथ 
जीने की नयी उम्मीद के साथ 
नयी जमीं को ओर 

जहाँ पे जा टिकूंगी 
वहीं  मंज़िल होगी 
वहीं बसेरा होगा 

रात की चद्दर ओढ़े सोये हुए उसे शायर ने पूछा
कहाँ है वो ?
जो मेरे दिल में रहती है,
जो मेरे ख्वाबोंमे आती है,
जो मेरी सासोंको मेहकाती है,
दीवाना बनाती है।

चद्दर से झाँकते उस चाँद ने हंसकर जवाब दिया
शायर , में भी उसे सदियोंसे ढूँढ रहा हूँ,
तुम्हारे ख़्वाबोंमें।

मेरी दीवानगी का आलम न पूछो
इन साँसोपे लिखा नाम न पूछो

चलती है सांसे जिसके इंतजार में
उसकी बेवफाई का राज न पूछो

तुम्हे पाने में बरसों गुजर गए
तुम्हारी एक नजर का हश्र न पूछो

ज़िंदा तो हम बचपन से ही है
तुम्हारे साथ बिताये पलोंका हिसाब न पुछो

मेरी दीवानगी का आलम न पूछो
इस दिल में रेहनेवालेका नाम न पूछो

आज मुडके खुद को देखा
सिर्फ़ पिंजर दिखायी दिया
वो बोज़ल सी आँखे , थका हुआ दिल
केह रहा था , दूर जा
यहाँ पे अब कुछ नहीं रहा
सुखी मिटटी का ढेर है ये
बस एक हवा का झोंका आने की देर है
कल वो भी न दिखेगा तुझे
चला जा, जहाँ ज़िंदगी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है
वो पर्बत, पेड़ , वो झरने , वो दरीयां
सब तुम्हारे हैं, बस्स तुम्हारे

Thursday, 5 March 2015

तुम


ढूँढती हुँ तुम्हें 
कहीं तो मिल जाया करो
हक़ीक़त में ना सही, 
ख़्वाबों में तो मिल जाया करो

दिल धड़कता है तुम्हारा नाम सुनके
कभी उस बेज़ुबान की धड़कन में मिल जाया करो
सासें चलती हैं तुम्हारी नज़्मों पर 
कभी मेरी नज़्मों में भी मिल जाया करो