Friday, 27 March 2015

नया बसेरा

दिल करता है , कहीं उड़ाती चली जाऊँ 
उस सूखे पत्ते की तरह 
जो अभी अभी शाख से हवा ने उड़ाया है 
उस सफ़ेद आक की तरह 
जो अभी अभी हवा में उड़ने लगी है 
उस पतंग की तरह 
जो अभी अभी कट गयी है 
उस बच्चे के हाथ से छूटे गुब्बारे की तरह 
जो हवा के साथ किसी अंजाने सफर पे निकली है 

ना रास्ते का पता हैं 
ना मंज़िल का 
ना किसी का साथ है 
ना साथ होने की उम्मीद 

बस उड़ते जाना है 
हवा के साथ 
जीने की नयी उम्मीद के साथ 
नयी जमीं को ओर 

जहाँ पे जा टिकूंगी 
वहीं  मंज़िल होगी 
वहीं बसेरा होगा 

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