Thursday, 29 January 2015

समय

कहते हैं समय समय की बात है,
समय निकालता जायेगा तो बात भी निकल जाएगी,
पर मेरा समय तो वहीँ पे ठहरा है,
जब तुमने अपनी ख़ुश्क आँखोंसे मुझसे कहा था,
समय यहीँ पे रुकना चाहिए , हम दोनों के बीच,
आगे जायेगा तो हमारे सपनों को खो देगा

तब से वहीँ पे खड़ा हुँ,
हमारे सपनों को संभाले , उसी समय में
जब तुम आओगी ना , तो देख लेना

न जाने इतनी देर क्युँ लगायी है तुमने,
क्या तुमने भी समय को पकड़ रखा है?

जबतक ये समय आगे नहीं जायेगा ,
तबतक तुम  नहीं आयोगी
पर इसे कैसे जाने दूँ ?, तुम्ही ने कहा था,
समय आगे जायेगा, तो हमारे सपनों को खो देगा 

Tuesday, 20 January 2015

ख्वाबोंका शहर

सेहर ने आँखे भी न खोली थी
और राह चलते न जाने कहाँ भटक गयी थी 
कोई अलग ही सड़क थी 
आगे ख्वाबोंके शहर का मनज़र दिखाई दे रहा था
सड़क के उस पार से झाँक रहा था
इतना प्यारा और सजीला लग रहा था के पूछो मत
बहोत मुसर्रत हुयी मुझे
जल्दी जल्दी  चलने लगी, उससे मिलना जो था
उस शहर से आती ताज़ी हवा ने सासोंको महका दिया
मन तरोताज़ा हो गया
वहाँ पे क्या न था ?

तुम्हारे - मेरे ख्वाब थे , बहोत सारे
कुछ जो हमने मिलके देखे थे
कुछ मुकम्मल ख्वाब भी दिखाई दे रहे थे
और कुछ ग़ैर मुकम्मल ख़्वाब भी थे जिन्हे बीच रास्ते छोड़ दिया था
कुछ नये ख़्वाब भी थे वहाँ और कुछ पुराने भी
आज न जाने क्यों उनसे मिलने के लिये दिल तड़प रहा था 


मेरी इस शिद्दत से अंजान,जैसे ही सेहर ने आँखे खोली
हाय , मेरा ख्वाबोंका शहर पिघलने लगा
मैं भाग रही थी , कुछ तो मेहफ़ूज़ रखुँ 
पर ओस की कुछ बुँदोंके अलावा मेरे ख़ाली हाथोमे कुछ़ न बचा






मेरी डायरी

जिसमें मै अपने दिल की बातें लिखा करती थी
मेरी ख़ुशी मानो उसकी ख़ुशी हुआ करती थी
जब अपने गम उसे सुनाती , गुमसुम रेहती मेरी तरह
कुछ नहीं बोलती थी
कोई पढ़ ना ले इसलिए फाड़ने भी देती अपने अंगोंको
उसे बहोत प्यार था मुझसे और मुझे उससे

ज़िन्दगी की राहोंमे न जाने कैसे बिछड़ गए हम
एक दूसरे के बिना एक पल भी न रेहने वाले हम
बरसों हो गए , एक दुसरेके को देखे
अकेली हूँ तबसे
ढुंढती हूँ उसे

उसकी बहनें मील जाती हैं
पर उनसे बात नहीं कर पाती
डरती हुँ , कहीं ये किसी के सामने कुछ ना दे

Friday, 16 January 2015

जुगनू

पेडोंको जगमगाते देखा है, बचपनमें
उन्हें खिल उठते देखा है
ढेरों जुगनूं चमकते देखें है
मानो परीयोंनें दियासलाई लगायी हो

जी करता उन्हें पकड़ कर रखुँ , अपनी मुट्ठी में
फिर मेरी मुट्ठी भी जगमगाये
उनतक हाथ पहुंचते ही नहीं थे
कभी गलती से पकड़ भी लेती , तो वो मर जाते

अब तो वैसे भी कम नज़र आते है
अगर मिलें तो भी न पकडुं उन्हें
अब हाथ भी इतने मैले हैं
कितने भी जुगनू पकडुं
मुट्ठी कहाँ जगमगाएगी?

वादी

रात ने जाते जाते कोहरे की चद्दर ओढ़ा दी 
बहोत शांति से सो रही थी वो वादी 
कहीं कोई आवाज़ नहीं 
मानो बहोत दिनों बाद ऐसी नींद मिली थी उसे 

आज तो सूरज भी देर से उगा 
कोहरे की चादर हटा के, उसने वादी का सिर चुम लिया 
वादी शरमा गयी 
उसने कोहरे की चद्दर में सिर छुपाना चाहा 
पर सूरज प्यार से परे नहीं कर पायी 

धीरे धीरे आँखे खोलके उसने सूरज की तरफ देखा 
प्यार भरी हवा वादी में घूमने लगी 

Wednesday, 14 January 2015

ख़्वाब

कभी कभी दिल करता है
किसी अंजान सडक पे निकलुँ
अपने ख्वाब , ख़याल सब बस्ते में बांधके चल पडूँ 
अजनबी लोगोंके अजनबी ख्वाबोँसे मिलने
देखुँ उनके ख़्वाब , उनके ख़्वाबोंके शहर
ढुँढू उसमें अपने चेहरोंके ख़्वाब
मिले तो बस जाऊँ वहीं पे
नहीं तो निकल पडूँ , अगले दिन अगले पड़ाव की तरफ़ 

Tuesday, 13 January 2015

रात

रात धीमें पाँव आयी थी
बड़ी उदास लग रही थी
सूरज के साथ जाती शाम को देख के ,  ठंडी साँसे भी भरी थी
बड़ी बेचैन थी
आज तो चाँद भी छुपाया था उसने

इसी उदासी में शायर पास आयी
शायर ने बड़े प्यार से कहा ,
'बहोत इंतजार करवाती है तू
पुरा दिन ढलने तक नहीं आती
तुझे देखुँ तो शेर सुझे , नहीं तो मानो जिंदगी थम जाती है '

रात मन ही मन खिल गयी
उसने बादलोंमें छुपाया चाँद शायर को दिखाया और कहा
'आजसे ये तुम्हारा , मेरी ज़िंदगी का ये लम्हा, हसीन कर दिया तुमने '

रात ने जाते जाते गम भरे उस दिल को सेहलाया
शायर को मेहसुस हुआ
एक ठंडी हवा का जोंका उसके दिल को छुता निकल गया



Monday, 12 January 2015

तितली

अंगबी ढूंढते ढूंढते न जाने कहाँ आ गयी
वो तितली , बहोत प्यारी सी
अपने पंखों पर बहोत नाज़ था उसे
उसके चमकीले रंगोंको देखके , खुद ही खो जाती
पंखोंकी नक्काशी तो जान से प्यारी थी उसे
पल दो पल रुक के प्यारसे देख भी लेती थी

माँ वो देखो , कितने सुन्दर पंख है तितली के
वो बच्चा पकड़ने दौड़ा उसे

दुनिया से अनजान , अंगबी ढूंढती वो
एक फूल से दूसरे फूल जा रही थी
थक गयी और दो पल के लिए फूल पे बैठ गयी

अगले ही पल किसी का हाथ पड़ा
और वो मिटटी में गिरी , तड़पती

वो बच्चा बहोत खुश हुआ
माँ , कितने सुन्दर पंख है देखो
इन्हे अपने किताब में रखूँगा

वो अजल गिरफ़्ता समज़ नहीं पायी
पंख कहाँ गए ,  उसके चमकीले पंख
देखते देखते उसकी आँखे बंद हो गयी

अंगबी - शहद
अजल गिरफ़्ता- मौत के मुँह में

जिंदगी

ज़िंदगी मानो दो हिस्सों में बंट गयी है
एक हिस्सा बचपन का था
बहोत सी यादों से जुड़ा
जब चाँद पे खरगोश दिखता था
नदी मानो समंदर लगती थी
बस का सफर सपनोंमे खत्म होता था
इन्द्रधनुषसे फिसलने को जी मचलता था
स्कुल के बाहर बैठी मौसी से कैरी लेकर खाना मानो हक़ था
घर बहोत बड़ा लगता था , मानो एक सिरे से दुसरे सिरे जाने के लिए साइकल लगेगी
हर पेड़ आसमाँ को छुता नज़र आता, उसपे चढनेकी होड़ लगी रेहती
इमली का बुटा चटखाने में मज़ा आता
बारीश में भीगने से डर नहीं लगता था
जाड़ों में अलाव जलाके घंटो उसके सामने बैठनेमें मज़ा आता
दोस्तों से  झगड़ा करना मानो रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था
माँ-बाबा को देखके लगता था वो कभी बूढ़े नहीं होंगे दादा-दादी की तरह
जिंदगी हसीन लगती थी , फिर भी बड़े होते का इंतज़ार रेहता था

अब ज़िन्दगी का दूसरा हिस्सा है
जहाँ पे माँ -बाबा बूढ़े दिखाई देते है
अब घर उतना बड़ा नहीं लगता
अब पेड़ पे चढ़ाना मनो किसी और दुनिया में जाना
इमली का बूटा देखके अब चटखने को जी नहीं करता
अब बारिश में भीगनेसे डर लगता है

सब बदल गया
मैं भी कहाँ छोटी रही अब ?
जिंदगी  ने बड़े होने की चाह पूरी भी की और ऐसे सबक सिखाये
जो कभी भूल नहीं सकती





नींद आ रही है

कल जब तुम बातें कर रहे थे ,
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

तुम नहीं थे , तब आती ही नहीं थी
कहीं पे जा बसती थी , बिना बताये
कितना भी बुलाओ , ध्यान ही नहीं देती थी
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

रात की स्याही में डुबें हुए तारों को मैं देखती रहती
कभी कभी तो उस स्याही से तुम्हारा नाम लिखा करती थी
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

यादों में डूबकर जब पूरी रात तुम्हें पुकारा करती , कहीं से कोई जवाब न आता
सूरज निकल आता , पर नींद नहीं
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

अब जब तुम आ गए हो , मेरे पास हो
तो दूर ही नहीं जा रही , तुम्हारी गोदी में इतने सपने सजा रही है
उफ़ , के पूछो मत
पर जब तुम नहीं थे, तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी 

Friday, 9 January 2015

चाँद-४

आज चाँद जमीं के इतने करीब था
के मेरे हाथों में आ गया

मेरा हाथ अपने हाथोंमें लेकर
ले गया मुझे , दुनिया की सैर कराने

कितने पहाड़ , नदियाँ , पेड़ , झरने पीछे गए
सबको छोड़ के हम दूर ही जा रहे थे
मानो अपनी दुनियाँ खोज़ रहे थे

बहोतसीं बातें भी की हमनें
ऐसे लग रहा था कोई भटकता सय्यारा घर वापस आ गया हो

तुम भी कभी आना , चाँद की तरह
अपने हाथों में , मेरा हाथ लेके , ले जाना मुझे चाँद के उस पार
तुम्हारी दुनियाँ में

Thursday, 8 January 2015

चाँद-3

लुकछुपी खेलता रेहता है उसकेसाथ
कभी बादलोंके पीछे छुपकर , तो कभी किसी पहाड़ी के पीछे
कभी किसी पेड़ के पीछे , तो कभी एकदम से सामने आके चौंका भी देता है
पर सूरज जब आता है , तो ये छुप जाता है
उसके गुस्से से डरता है शायद
जिस दिन वो नहीं दिखता , बेहाल होती है वो
उसका दिल नहीं लगता , ढूंढती है उसे
कहाँ गया ? कहाँ गया?
कही उफ़क़ के पार सूरज ने उसे पकड़ के तो नहीं रखा ?
और दूसरे दिन जब वो झाँकता है , फुली नहीं समाती वो
उसके जिगर का टुकड़ा जो है
वो चाँद , जिसने उसकी कोख से जनम लिया है।


Tuesday, 6 January 2015

चाँद-२

आज चाँद जमीं के इतने करीब था , के मानो हाथोंमें समां जाये
भिखारी बच्ची ने पकडनेकी कोशिश भी की
पगली कहीं की
कभी चाँद भी भिखरियोंके हाथ लगता हैं ?
नहीं समज़ती
वो आसमां में ही रहता हैं
वो तुम्हे दिखता है काफ़ी है
नहीं तो कलसे उसे देखने के भी पैसे पड़ेंगे 

Saturday, 3 January 2015

कुलधारा

कल जब कुलधारा देखके वापस आ रहे थे
एकही सवाल बारबार जेहन में उठ रहा था
कितने ढीट थे वो लोग
जो अपनी लडकियोंको बचाने के लिए भाग गये
पंच्चासी गाँव पलक झपकतेही ख़ाली हो गये

आज भी कुलधारा वहीँ खड़ा है
कुर्बानी साथ लेके
टूरिस्ट आते है उसे देखने
फ़ोटो खींचके वापस चले जाते हैं
कोई उसकी सिसकियाँ नहीं सुनता
कोई मिनट दो मिनट रुककर नहीं सेहलाता उसे

किसी ज़माने में किलकारियाँ गुँजती होंगी यहाँ
हँसी के फ़व्वारे छुटते होंगे
काँच की चूड़ियाँ खनकती होंगी
गरम गरम रोटी भी पकती होगी
नयी नवेली शरमाती दुल्हन की डोली आती होगी
बूढी मौसी की खांसी रातभर सुनाई देती होगी

आज सब सुना है ,  खाली है
पत्थरों के ढ़ेर के साथ ज़िन्दगी बीत रही है उसकी
कहाँ गए वो सब ,जिनको वो अपना कहता था ?
कहीं कोई होगा , जो उसका साथ दे? उसे अपना कहे?
उसकी ज़िन्दगी उसे वापस दे दे?


* कुलधारा - जैसलमेर से १५ कि मी की दुरी पर एक ख़ाली गाँव है।  ऐसा मानते है गांववाले एकही रात में गाँव छोड़ गए।  एक दुष्ट प्रधान से अपने लडकियोंको बचाने के लिए
             

चाँद

पुरा चाँद कभी देखो तो पता चलेगा ज़िंदगी क्या है
अपनी धुन में खोया चाँद
दोनों हाथोंसे सितारे लुटाते देखा है
लुटाते लुटाते ख़ुद भी लुट जाते देखा है
शरमाके बादलोंमें छुपते भी देखा है
और फिर ज़िंदगी से हाथ मिलातेभी देखा है

सितारें

ये सितारें भीं देखो, कितने बत्तमीज है
जब अवस आती है, तो चाँद को अपनी गिरह़ में छुपा लेते है
फिर धीरे धीरे उसे बाहर निकालते है
जताना चाहते है, चाँद उनका है, हमारा नहीं


Friday, 2 January 2015

पन्नें

बिखरे पन्नोंसी ज़िंदगी है
कुछ़ मेरे पन्नें तुम्हारे पास है

ज़िंदगी अधुरी है, उन पन्नोंबीना

अधुरे पन्नोंसे पुरी किताब नहीं बनती
अधुरी ज़िंदगी की कोई किताब नहीं बनती। 

Thursday, 1 January 2015

लकीरें

वो हाथोंको ग़ौर से देख रही थी,
मैंने पुछा,"क्या देख रही हो?"
"तुम्हारा नाम ,अपनी लकीरों में"
उसके हाथ अपने हाथोंमें लेकर मैंने कहा,
"मेरी आँखों में देखो तुम अपने हाथोंको,
तुम्हें मेरा और तुम्हारा नाम लकीरों में मिल जायेगा"