Tuesday, 20 January 2015

ख्वाबोंका शहर

सेहर ने आँखे भी न खोली थी
और राह चलते न जाने कहाँ भटक गयी थी 
कोई अलग ही सड़क थी 
आगे ख्वाबोंके शहर का मनज़र दिखाई दे रहा था
सड़क के उस पार से झाँक रहा था
इतना प्यारा और सजीला लग रहा था के पूछो मत
बहोत मुसर्रत हुयी मुझे
जल्दी जल्दी  चलने लगी, उससे मिलना जो था
उस शहर से आती ताज़ी हवा ने सासोंको महका दिया
मन तरोताज़ा हो गया
वहाँ पे क्या न था ?

तुम्हारे - मेरे ख्वाब थे , बहोत सारे
कुछ जो हमने मिलके देखे थे
कुछ मुकम्मल ख्वाब भी दिखाई दे रहे थे
और कुछ ग़ैर मुकम्मल ख़्वाब भी थे जिन्हे बीच रास्ते छोड़ दिया था
कुछ नये ख़्वाब भी थे वहाँ और कुछ पुराने भी
आज न जाने क्यों उनसे मिलने के लिये दिल तड़प रहा था 


मेरी इस शिद्दत से अंजान,जैसे ही सेहर ने आँखे खोली
हाय , मेरा ख्वाबोंका शहर पिघलने लगा
मैं भाग रही थी , कुछ तो मेहफ़ूज़ रखुँ 
पर ओस की कुछ बुँदोंके अलावा मेरे ख़ाली हाथोमे कुछ़ न बचा






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