Thursday, 8 January 2015

चाँद-3

लुकछुपी खेलता रेहता है उसकेसाथ
कभी बादलोंके पीछे छुपकर , तो कभी किसी पहाड़ी के पीछे
कभी किसी पेड़ के पीछे , तो कभी एकदम से सामने आके चौंका भी देता है
पर सूरज जब आता है , तो ये छुप जाता है
उसके गुस्से से डरता है शायद
जिस दिन वो नहीं दिखता , बेहाल होती है वो
उसका दिल नहीं लगता , ढूंढती है उसे
कहाँ गया ? कहाँ गया?
कही उफ़क़ के पार सूरज ने उसे पकड़ के तो नहीं रखा ?
और दूसरे दिन जब वो झाँकता है , फुली नहीं समाती वो
उसके जिगर का टुकड़ा जो है
वो चाँद , जिसने उसकी कोख से जनम लिया है।


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