Friday, 9 January 2015

चाँद-४

आज चाँद जमीं के इतने करीब था
के मेरे हाथों में आ गया

मेरा हाथ अपने हाथोंमें लेकर
ले गया मुझे , दुनिया की सैर कराने

कितने पहाड़ , नदियाँ , पेड़ , झरने पीछे गए
सबको छोड़ के हम दूर ही जा रहे थे
मानो अपनी दुनियाँ खोज़ रहे थे

बहोतसीं बातें भी की हमनें
ऐसे लग रहा था कोई भटकता सय्यारा घर वापस आ गया हो

तुम भी कभी आना , चाँद की तरह
अपने हाथों में , मेरा हाथ लेके , ले जाना मुझे चाँद के उस पार
तुम्हारी दुनियाँ में

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