पेडोंको जगमगाते देखा है, बचपनमें
उन्हें खिल उठते देखा है
ढेरों जुगनूं चमकते देखें है
मानो परीयोंनें दियासलाई लगायी हो
जी करता उन्हें पकड़ कर रखुँ , अपनी मुट्ठी में
फिर मेरी मुट्ठी भी जगमगाये
उनतक हाथ पहुंचते ही नहीं थे
कभी गलती से पकड़ भी लेती , तो वो मर जाते
अब तो वैसे भी कम नज़र आते है
अगर मिलें तो भी न पकडुं उन्हें
अब हाथ भी इतने मैले हैं
कितने भी जुगनू पकडुं
मुट्ठी कहाँ जगमगाएगी?
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