Monday, 12 January 2015

तितली

अंगबी ढूंढते ढूंढते न जाने कहाँ आ गयी
वो तितली , बहोत प्यारी सी
अपने पंखों पर बहोत नाज़ था उसे
उसके चमकीले रंगोंको देखके , खुद ही खो जाती
पंखोंकी नक्काशी तो जान से प्यारी थी उसे
पल दो पल रुक के प्यारसे देख भी लेती थी

माँ वो देखो , कितने सुन्दर पंख है तितली के
वो बच्चा पकड़ने दौड़ा उसे

दुनिया से अनजान , अंगबी ढूंढती वो
एक फूल से दूसरे फूल जा रही थी
थक गयी और दो पल के लिए फूल पे बैठ गयी

अगले ही पल किसी का हाथ पड़ा
और वो मिटटी में गिरी , तड़पती

वो बच्चा बहोत खुश हुआ
माँ , कितने सुन्दर पंख है देखो
इन्हे अपने किताब में रखूँगा

वो अजल गिरफ़्ता समज़ नहीं पायी
पंख कहाँ गए ,  उसके चमकीले पंख
देखते देखते उसकी आँखे बंद हो गयी

अंगबी - शहद
अजल गिरफ़्ता- मौत के मुँह में

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