Monday, 12 January 2015

नींद आ रही है

कल जब तुम बातें कर रहे थे ,
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

तुम नहीं थे , तब आती ही नहीं थी
कहीं पे जा बसती थी , बिना बताये
कितना भी बुलाओ , ध्यान ही नहीं देती थी
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

रात की स्याही में डुबें हुए तारों को मैं देखती रहती
कभी कभी तो उस स्याही से तुम्हारा नाम लिखा करती थी
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

यादों में डूबकर जब पूरी रात तुम्हें पुकारा करती , कहीं से कोई जवाब न आता
सूरज निकल आता , पर नींद नहीं
तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी

अब जब तुम आ गए हो , मेरे पास हो
तो दूर ही नहीं जा रही , तुम्हारी गोदी में इतने सपने सजा रही है
उफ़ , के पूछो मत
पर जब तुम नहीं थे, तब न जाने ये नींद कहाँ गायब हो गयी थी 

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