Wednesday, 14 January 2015

ख़्वाब

कभी कभी दिल करता है
किसी अंजान सडक पे निकलुँ
अपने ख्वाब , ख़याल सब बस्ते में बांधके चल पडूँ 
अजनबी लोगोंके अजनबी ख्वाबोँसे मिलने
देखुँ उनके ख़्वाब , उनके ख़्वाबोंके शहर
ढुँढू उसमें अपने चेहरोंके ख़्वाब
मिले तो बस जाऊँ वहीं पे
नहीं तो निकल पडूँ , अगले दिन अगले पड़ाव की तरफ़ 

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