Saturday, 3 January 2015

कुलधारा

कल जब कुलधारा देखके वापस आ रहे थे
एकही सवाल बारबार जेहन में उठ रहा था
कितने ढीट थे वो लोग
जो अपनी लडकियोंको बचाने के लिए भाग गये
पंच्चासी गाँव पलक झपकतेही ख़ाली हो गये

आज भी कुलधारा वहीँ खड़ा है
कुर्बानी साथ लेके
टूरिस्ट आते है उसे देखने
फ़ोटो खींचके वापस चले जाते हैं
कोई उसकी सिसकियाँ नहीं सुनता
कोई मिनट दो मिनट रुककर नहीं सेहलाता उसे

किसी ज़माने में किलकारियाँ गुँजती होंगी यहाँ
हँसी के फ़व्वारे छुटते होंगे
काँच की चूड़ियाँ खनकती होंगी
गरम गरम रोटी भी पकती होगी
नयी नवेली शरमाती दुल्हन की डोली आती होगी
बूढी मौसी की खांसी रातभर सुनाई देती होगी

आज सब सुना है ,  खाली है
पत्थरों के ढ़ेर के साथ ज़िन्दगी बीत रही है उसकी
कहाँ गए वो सब ,जिनको वो अपना कहता था ?
कहीं कोई होगा , जो उसका साथ दे? उसे अपना कहे?
उसकी ज़िन्दगी उसे वापस दे दे?


* कुलधारा - जैसलमेर से १५ कि मी की दुरी पर एक ख़ाली गाँव है।  ऐसा मानते है गांववाले एकही रात में गाँव छोड़ गए।  एक दुष्ट प्रधान से अपने लडकियोंको बचाने के लिए
             

चाँद

पुरा चाँद कभी देखो तो पता चलेगा ज़िंदगी क्या है
अपनी धुन में खोया चाँद
दोनों हाथोंसे सितारे लुटाते देखा है
लुटाते लुटाते ख़ुद भी लुट जाते देखा है
शरमाके बादलोंमें छुपते भी देखा है
और फिर ज़िंदगी से हाथ मिलातेभी देखा है

सितारें

ये सितारें भीं देखो, कितने बत्तमीज है
जब अवस आती है, तो चाँद को अपनी गिरह़ में छुपा लेते है
फिर धीरे धीरे उसे बाहर निकालते है
जताना चाहते है, चाँद उनका है, हमारा नहीं


Friday, 2 January 2015

पन्नें

बिखरे पन्नोंसी ज़िंदगी है
कुछ़ मेरे पन्नें तुम्हारे पास है

ज़िंदगी अधुरी है, उन पन्नोंबीना

अधुरे पन्नोंसे पुरी किताब नहीं बनती
अधुरी ज़िंदगी की कोई किताब नहीं बनती। 

Thursday, 1 January 2015

लकीरें

वो हाथोंको ग़ौर से देख रही थी,
मैंने पुछा,"क्या देख रही हो?"
"तुम्हारा नाम ,अपनी लकीरों में"
उसके हाथ अपने हाथोंमें लेकर मैंने कहा,
"मेरी आँखों में देखो तुम अपने हाथोंको,
तुम्हें मेरा और तुम्हारा नाम लकीरों में मिल जायेगा"