Tuesday, 14 April 2015

किश्त

ज़िन्दगी किश्तोंमे बिताती है
कोई किश्त बचपन की तो कोई जवानी की
हर किश्त की अपनी कहानी होती है
हर किश्त की अपनी आह होती है


कभी दोहराना चाहुँ तो सिर्फ यादोंके चिकटठे मिलते है
किश्ते वापस नहीं मिलती

वो साहूकार जो ऊपर बैठा है , किश्ते लिए जाता है
उसका असल कभी चूका नहीं पाते हम

और इन्ही किश्तोंके के साथ दुनियासे उठ भी जाते है
अपनी कुछ यादें छोड़कर , असल लेकर

ज़िन्दगी की आखरी किश्त पूरी करते
ज़िन्दगी किश्तों में बंटी है 

Tuesday, 7 April 2015

दो पलोंका हिसाब नहीं मिल रहा
न जाने कहाँ छूट गए

कल वक़्त में झाँक कर देखा
तो तुम्हारे पास पड़े थे

कभी हमारी गली आना हो तो , साथ लेके आना
हिसाब पूरा होगा 

Friday, 27 March 2015

नया बसेरा

दिल करता है , कहीं उड़ाती चली जाऊँ 
उस सूखे पत्ते की तरह 
जो अभी अभी शाख से हवा ने उड़ाया है 
उस सफ़ेद आक की तरह 
जो अभी अभी हवा में उड़ने लगी है 
उस पतंग की तरह 
जो अभी अभी कट गयी है 
उस बच्चे के हाथ से छूटे गुब्बारे की तरह 
जो हवा के साथ किसी अंजाने सफर पे निकली है 

ना रास्ते का पता हैं 
ना मंज़िल का 
ना किसी का साथ है 
ना साथ होने की उम्मीद 

बस उड़ते जाना है 
हवा के साथ 
जीने की नयी उम्मीद के साथ 
नयी जमीं को ओर 

जहाँ पे जा टिकूंगी 
वहीं  मंज़िल होगी 
वहीं बसेरा होगा 

रात की चद्दर ओढ़े सोये हुए उसे शायर ने पूछा
कहाँ है वो ?
जो मेरे दिल में रहती है,
जो मेरे ख्वाबोंमे आती है,
जो मेरी सासोंको मेहकाती है,
दीवाना बनाती है।

चद्दर से झाँकते उस चाँद ने हंसकर जवाब दिया
शायर , में भी उसे सदियोंसे ढूँढ रहा हूँ,
तुम्हारे ख़्वाबोंमें।

मेरी दीवानगी का आलम न पूछो
इन साँसोपे लिखा नाम न पूछो

चलती है सांसे जिसके इंतजार में
उसकी बेवफाई का राज न पूछो

तुम्हे पाने में बरसों गुजर गए
तुम्हारी एक नजर का हश्र न पूछो

ज़िंदा तो हम बचपन से ही है
तुम्हारे साथ बिताये पलोंका हिसाब न पुछो

मेरी दीवानगी का आलम न पूछो
इस दिल में रेहनेवालेका नाम न पूछो