Friday, 9 January 2015

चाँद-४

आज चाँद जमीं के इतने करीब था
के मेरे हाथों में आ गया

मेरा हाथ अपने हाथोंमें लेकर
ले गया मुझे , दुनिया की सैर कराने

कितने पहाड़ , नदियाँ , पेड़ , झरने पीछे गए
सबको छोड़ के हम दूर ही जा रहे थे
मानो अपनी दुनियाँ खोज़ रहे थे

बहोतसीं बातें भी की हमनें
ऐसे लग रहा था कोई भटकता सय्यारा घर वापस आ गया हो

तुम भी कभी आना , चाँद की तरह
अपने हाथों में , मेरा हाथ लेके , ले जाना मुझे चाँद के उस पार
तुम्हारी दुनियाँ में

Thursday, 8 January 2015

चाँद-3

लुकछुपी खेलता रेहता है उसकेसाथ
कभी बादलोंके पीछे छुपकर , तो कभी किसी पहाड़ी के पीछे
कभी किसी पेड़ के पीछे , तो कभी एकदम से सामने आके चौंका भी देता है
पर सूरज जब आता है , तो ये छुप जाता है
उसके गुस्से से डरता है शायद
जिस दिन वो नहीं दिखता , बेहाल होती है वो
उसका दिल नहीं लगता , ढूंढती है उसे
कहाँ गया ? कहाँ गया?
कही उफ़क़ के पार सूरज ने उसे पकड़ के तो नहीं रखा ?
और दूसरे दिन जब वो झाँकता है , फुली नहीं समाती वो
उसके जिगर का टुकड़ा जो है
वो चाँद , जिसने उसकी कोख से जनम लिया है।


Tuesday, 6 January 2015

चाँद-२

आज चाँद जमीं के इतने करीब था , के मानो हाथोंमें समां जाये
भिखारी बच्ची ने पकडनेकी कोशिश भी की
पगली कहीं की
कभी चाँद भी भिखरियोंके हाथ लगता हैं ?
नहीं समज़ती
वो आसमां में ही रहता हैं
वो तुम्हे दिखता है काफ़ी है
नहीं तो कलसे उसे देखने के भी पैसे पड़ेंगे 

Saturday, 3 January 2015

कुलधारा

कल जब कुलधारा देखके वापस आ रहे थे
एकही सवाल बारबार जेहन में उठ रहा था
कितने ढीट थे वो लोग
जो अपनी लडकियोंको बचाने के लिए भाग गये
पंच्चासी गाँव पलक झपकतेही ख़ाली हो गये

आज भी कुलधारा वहीँ खड़ा है
कुर्बानी साथ लेके
टूरिस्ट आते है उसे देखने
फ़ोटो खींचके वापस चले जाते हैं
कोई उसकी सिसकियाँ नहीं सुनता
कोई मिनट दो मिनट रुककर नहीं सेहलाता उसे

किसी ज़माने में किलकारियाँ गुँजती होंगी यहाँ
हँसी के फ़व्वारे छुटते होंगे
काँच की चूड़ियाँ खनकती होंगी
गरम गरम रोटी भी पकती होगी
नयी नवेली शरमाती दुल्हन की डोली आती होगी
बूढी मौसी की खांसी रातभर सुनाई देती होगी

आज सब सुना है ,  खाली है
पत्थरों के ढ़ेर के साथ ज़िन्दगी बीत रही है उसकी
कहाँ गए वो सब ,जिनको वो अपना कहता था ?
कहीं कोई होगा , जो उसका साथ दे? उसे अपना कहे?
उसकी ज़िन्दगी उसे वापस दे दे?


* कुलधारा - जैसलमेर से १५ कि मी की दुरी पर एक ख़ाली गाँव है।  ऐसा मानते है गांववाले एकही रात में गाँव छोड़ गए।  एक दुष्ट प्रधान से अपने लडकियोंको बचाने के लिए
             

चाँद

पुरा चाँद कभी देखो तो पता चलेगा ज़िंदगी क्या है
अपनी धुन में खोया चाँद
दोनों हाथोंसे सितारे लुटाते देखा है
लुटाते लुटाते ख़ुद भी लुट जाते देखा है
शरमाके बादलोंमें छुपते भी देखा है
और फिर ज़िंदगी से हाथ मिलातेभी देखा है